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ईश्वरीय-ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में आना चाहिये

आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति April 05, 2021

परमेश्वर सब मनुष्यों के माता-पिता हैं। वे सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं । अतः परमेश्वर द्वारा जो ज्ञान दिया जायेगा वह सृष्टि के आदि [आरंभ] में दिया जायेगा। जिस से सृष्टि के आदि के लोग भी लाभ उठा सके और उन के पीछे आने वाले अन्य लोग भी लाभ उठा सके। इस कसौटी पर कसने पर वेद ही ईश्वरीय-ज्ञान ठहरता है। क्योंकि वेद ही सृष्टि के प्रारम्भ में दिया गया है। अन्य कोई भी धर्म-ग्रंथ सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट नहीं हुआ। कुरान को बने प्रायः 1400 वर्ष हुए हैं। बाइबल के ईसामसीह का यह 1957 [आज 2021] वर्ष चल रहा है और ईसाइयों के हजरत आदम को हुए भी प्रायः 6000 वर्ष हुए हैं। इस प्रकार बाइबिल अधिक से अधिक 6 हजार वर्ष पुरानी मानी जा सकती है और उस का अत्यधिक प्रामाणिक भाग नवीन खण्ड (न्यू टेस्टामैंट = New Testament ) तो 1959 [आज 2021] वर्ष से पुराना नहीं है। जिन्दावस्ता को पाश्चात्य विद्वान् लगभग 4000 वर्ष पुराना मानते हैं। इसी प्रकार अन्य धर्मग्रन्थ भी बहुत इधर के समय के हैं। एक वेद ही ऐसा ग्रन्थ है जो सृष्टि के आरम्भ का है।

इलहामी पुस्तकें सर्वाङ्ग सत्य के प्रकाश का दावा करती है। ऐसी अवस्था में किसी भी इलहामी पुस्तक का सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट होना आवश्यक है। सत्य के सर्वाङ्ग पूर्ण प्रकाश की आवश्यकता सब से अधिक उस समय है जब कि पहले-पहल मनुष्य जाति की सृष्टि हुई। उस समय का मनुष्य बिना सिखाये कुछ भी नहीं सीख सकता था। जो पुस्तक सर्वाङ्ग सत्य के प्रकाश का दावा करती है उसे सृष्टि के शुरू में होना चाहिये। नहीं तो सृष्टि के शुरू में सर्वाङ्ग सत्य का परिज्ञान न होने कारण यदि सृष्टि-काल के मनुष्य कुछ अधर्माचरण कर बैठे - जो कि वे अवश्य करेंगे क्योंकि उन्हें धर्म का पूरा ज्ञान नहीं होगा - तो उसका परिणाम उन्हें नहीं भुगतना चाहिये। इस अधर्माचरण में उन का कोई दोष नहीं है। किसी का दोष है तो ईश्वर का। क्योंकि उस ने उन्हें धर्म का पूरा ज्ञान नहीं दिया। वेद के अतिरिक्त अन्य कोई भी पुस्तक सृष्टि के शुरू में नहीं हुई। यदि ये धर्म-पुस्तकें सर्वाङ्ग सत्य से युक्त होती और ईश्वरीय होती तो इन्हें सृष्टि के आरम्भ में होना चाहिये था। केवल वेद ही एक ऐसा धर्म-पुस्तक है जो सृष्टि के प्रारम्भ में आया है। अतः केवल वेद को ही ईश्वरीय ज्ञान या इलहाम माना जा सकता है।

[स्रोत : मेरा धर्म, पृ. 339-40, प्रथम संस्करण, 1957, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]