गोपथब्राह्मणभाष्यम्

Gopathbrahman Bhashyam

Sanskrit-Hindi Other(अन्य)
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  • By : Kshemkaran Das Trivedi
  • Subject : Brahman Granth
  • Category : Brahman Granth
  • Edition : 2015
  • Publishing Year : N/A
  • SKU# : N/A
  • ISBN# : 9788170846422
  • Packing : N/A
  • Pages : 596
  • Binding : Hard Cover
  • Dimentions : 9.0 INCH X 6.0 INCH
  • Weight : 1 GRMS

Keywords : Atharvaveda

गोपथ ब्राह्मणभाष्यम्

पुस्तक का नाम –  गोपथ ब्राह्मणभाष्यम्
भाष्यकार क्षेमकरणदास त्रिवेदी 
गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद का ब्राह्मण है। ऋषि दयानंद ने पठनपाठन विधि में इसका नाम प्रयुक्त किया है। यह ब्राह्मण दो भागों पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभक्त है। प्रथम भाग में पांच प्रपाठकः और द्वितीय भाग में छह प्रपाठकों में विभक्त है। ग्रन्थ में सर्वप्रथम ईश्वर के नाम ओम् की महिमा गाई गयी है। ओम् के प्रकृति प्रत्ययादि ३६ प्रश्न किये गये है तथा उनके रोचक उत्तर दिए गये हैं।
 दो अलंकारिक रोचक आख्यान प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया है कि उच्चारण करते समय प्रत्येक मन्त्र के पूर्व ओम् कहना चाहिए।
द्वितीय प्रपाठक के आरम्भ में ब्रह्मचारी तथा उसके कर्तव्यों का वर्णन है।
इसमें ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य का भी उल्लेख है। इसके आगे अंत तक छोटे-छोटे यज्ञों से लेकर अग्निष्टोम, सोमयाग आदि की चर्चा है। उस सम्बन्ध में बहुत सी आख्यायिकायें उद्धृत है।
ग्रन्थ में कतिपय स्थलों पर मांस अभक्षण की भी चर्चा है।
ग्रन्थ में ज्योतिष विषय पर भी अनेकों विवेचन है, इसमें पृथ्वी को गोल तथा गतिमान बताया है
प्रस्तुत भाष्य हिंदी भाषा में है। इसमें विभिन्न पाठों को ऐतरेयब्राह्मण से मिलाकर शुद्ध किया है। जो कंडिका अन्य ब्राह्मणों से मेल करती है उनके सभी उद्धरण ग्रन्थ में दिए है तथा अर्थ करते समय प्रायः यौगिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया है। शब्दों का व्युत्पति लभ्य अर्थ ही मान्य समझा गया है। प्रत्येक शब्द का व्याकरण सम्मत धातु प्रत्यय आदि दिखाते हुए उन्हें सिद्ध करने की पूरी चेष्टा की है। इस यौगिक प्रक्रिया के आश्रय से अनुचित और अनित्य इतिहास सम्बन्धित विवरण को नही आने दिया है। पशुबन्धादि शब्दों को देखकर जहां अन्य भाष्यकारों ने बुचडखाना सा खोल दिया था वहां भाष्यकार ने ऐसा नही होने दिया है उक्त स्थलों की समुचित व्याख्या कर उनका सत्यार्थ प्रकाशित किया है। इस दृष्टि से इस भाष्य का समस्त आर्य जगत में उचित प्रचार प्रसार की आवश्यकता है तथा वेदाध्यय करने वाले और वैदिक वाङ्मय का स्वाध्याय करने वाले जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत उपयुक्त सिद्ध होगा।