Vedrishi

अंत्येष्टि संस्कार

सामूहिक सामाजिक चेतना का महत्व किसी देश, समाज के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। समाज और देश की दशा और दिशा निर्धारण में इसका महत्व अतुलनीय है। सामाजिक चेतना का जागरण समाज में कैसे हो इसका एक उपाय यह है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति आत्मसुधार को प्रयासरत हो और इस प्रयास के प्रेरणास्रोत वर्तमान समाज में उपलब्ध हों। ऐसा नहीं है कि केवल गणमान्य लोग ही प्रेरणास्रोत स्तंभ का कार्य कर सकते हैं, कई बार सामान्य व्यक्ति किसी समान्य कार्य को उत्कृष्टता से संपन्न करने का बीड़ा उठा लेता है तो वह भी समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन जाती है और सकारात्मक परिवर्तन का आरंभ वहाँ से हो जाता है। परिवर्तन का कार्य स्वयं से आरंभ करना होता है तथा उपदेश वही प्रभावी होता है जिसका आचरण व्यक्ति स्वयं करे।

विगत कुछ दिनों पूर्व जब मेरे चाचाजी दिवंगत हुए तो उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर मैंने उनके दाहसंस्कार का कार्य संस्कार विधि के अनुसार सम्पन्न करने का कदम यह सोचकर बढ़ाया कि इससे संभवतः लोगों को भी प्रेरणाप्राप्त हो और पर्यावरण की सुरक्षा हेतु लोग इस कार्य का अनुकरण करें, और ऐसा हुआ भी। जिस गाँव के लोग टायर और मिट्टी तेल से दाहसंस्कार देखने के अभ्यस्त थे जब उन्होने मनों घी तथा हवन सामग्री, मेवे आदि से हवन के समान दाहसंस्कार होता देखा तो वे लोग उसकी स्मृति अपने संग ले गये।

इस घटना को अभी अधिक दिन व्यतीत भी नहीं हुए थे कि 15 फरवरी को आठ बजे मुझे आर्य समाज के प्रधान श्री सुजेश जी का दूरभाष आया की कल अंत्येष्टि संस्कार कराना है श्री बीरबल आर्य जी का देहावसान हो गया है। संस्कार संपन्न कराने की स्वीकृति देते हुए मैंने कहा मैं अवश्य आऊंगा| मुझे स्मरण हो आया कि कुछ दिनों पूर्व श्री भावेश मेरजा जी ने पूज्य स्वामी सत्यप्रकाश जी के अन्त्येष्टि संस्कार में प्रयुक्त सामग्रियों की सूची प्रकाशित की थी मैंने उसे ही आर्य समाज के प्रधान श्री सुजेश जी को प्रेषित कर दिया तथा उन्होंने उसे उनके सुपुत्र को भेज दी|

प्रातःकाल जब मैं पच्चीस प्रतियाँ अन्त्येष्टि संस्कार की पुस्तकें लेकर उनके घर पहुँचा तो अन्त्येष्टि स्थल पर मेरे द्वारा भेजी गयी सूची में उल्लेखित अंतिम संस्कार की लगभग सभी वस्तुओं को देखकर मुझे अत्यंत सुखद आश्चर्य हुआ| श्री गौरव अरोरा जी ने तो लगभग सभी वस्तुएं एकत्रित करवा दी थी|

यह प्रभाव था एक छोटी सी पहल का, एक छोटे से कदम का, एक क्षणिक संकल्प का, और ऐसे अच्छे संकल्प के मन में उद्बुद्ध होने के लिए मेरा कोटि-कोटि नमन मेरे गुरूजनों को जिन्होने मुझे शिक्षित करने और मुझे संकल्पवान बनाने का प्रगाढ़ पुरूषार्थ सम्पन्न किया।

व्यक्ति के जीवन में सोलह संस्कारों में से सभी संस्कारों को संपन्न करने-कराने का प्रचलन वर्तमान समय में नहीं रह गया है तथा कुछ संस्कारों में आवश्यकता से अधिक व्यय करने की परिपाटी चल पड़ी है। विवाह संस्कार को छोड़कर बाकि सारे संस्कारों को सम्पन्न करने में लगने वाला धन और समय देना लोगों को व्यर्थ लगने लगा है। ऐसे में यदि जीवन के अंतिम संस्कार की अत्यंत खर्चीली प्रक्रिया की बात की जावे तो अनेक लोग इसका विरोध करने उठ खड़े होंगे। किन्तु यहाँ एक बात विचारणीय है कि जीवन के अन्य संस्कारों का व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध अधिक होता है जबकि अंतिम संस्कार का समाज और पर्यावरण से लेना-देना अधिक है। जितने लोग इस संस्कार में सम्मिलित होंगे उन्हें सीधे तौर पर वहाँ के वातावरण के संपर्क में आना होता है तथा इसके वातावरण में उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभाव पूरे समाज के लिए प्रभावी होते हैं।

वर्तमान समय में अपसंस्कृति के प्रभाव के कारण भले ही भारतीय समाज में लोगों में सहयोग और भातृत्व भावना में कमी आयी हो किन्तु भारतीय समाज में उत्सव-संस्कार आदि कार्यों में समाज के लोगों द्वारा सहयोग की परंपरा रही है। बात घर में शिशु जन्म की हो अथवा विवाह, अन्त्येष्टि आदि, समाज के लोगों द्वारा सहयोग देखते बनता था। आज भी उत्सव, संस्कार आदि अवसरों पर सामाजिक सहयोग की परंपरा के अवशेष स्वरूप यज्ञोपवीत संस्कार के समय समाज के लोगों द्वारा कुछ राशि प्रदान की जाती है, पाणिग्रहण संस्कार के समय उपहारादि प्रदान किया जाता है। पूर्वकाल में इसी प्रकार अंत्येष्टि संस्कार में परिवार, सगे-संबंधियों तथा मुहल्ले समाज के लोगों द्वारा सहयोग की परंपरा के अवशेष स्वरूप कुछ राशि, दुशाला आदि प्रदान करना होता है। वर्तमान समय की आवश्यकता है कि उसी सहयोग परंपरा को पुनर्जीवित करके अत्येष्टि संस्कार के अवसर पर रिश्ते-समाज के लोग सहयोग स्वरूप यथासामर्थ्य घी आदि सामग्री लेकर अंत्येष्टि संस्कार में सम्मिलित होने जावें।

अंत्येष्टि संस्कार में व्यक्ति के अंतिम संस्कार को हिन्दू समाज में आज भी महत्व की दृष्टि से देखा जाता है किन्तु यह महत्व सामाजिक महत्व न होकर व्यक्तिगत महत्व बन गया है। समाज में अज्ञानता के कारण मरणोपरांत उत्तम सामग्री द्वारा शवदाह करना लोगों को व्यर्थ का खर्च लगने लगा है। निर्धन व्यक्ति के लिए तो लोग विचारते हैं कि बस किसी प्रकार शव-दाह हो जावे, जबकि यदि किसी भी व्यक्ति का शवदाह ठीक से न हो पावे तो उसका दुष्प्रभाव पूरे समाज को झेलना होगा। सामाजिक दृष्टिकोण से प्रभावी कार्यों की उपेक्षा के कारण ही आज समाज के लोगों को विभिन्न दुःख प्राप्त हो रहे हैं। रासायनिक खेती का दुष्प्रभाव अंततः कृषकों को भी भुगतना पड़ता है। पंजाब प्रांत की कैंसर एक्सप्रेस इसका ज्वलंत उदाहरण है। सामाजिक चेतना के ह्रास का ही परिणाम है कि घटिया गुणवत्ता के प्लास्टिक का सामान धन-लाभ प्राप्ति के लिए कंपनियाँ बना रही है जिसका भुगतान अंततः पूरी मानवता को करना पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार अंत्येष्टि कार्य में लापरवाही का दुष्प्रभाव पूरी मानवता हेतु प्रभावी है।

वर्तमान समय में समाज के प्रमुख लोगों का उत्तरदायित्व है कि यदि कोई निर्धन व्यक्ति का शवदाह होना हो तो उसकी उचित व्यवस्था समाज के लोग वहन करें और पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने में योगदान करें तथा यदि हवन कार्य न कर सके तो ठीक, किन्तु प्लास्टिक की थैलियों का कम प्रयोग, जैविक ईंधन डीजल-पेट्रोल-बैटरी से चलने वाले वाहनों का कम-से-कम प्रयोग करके भी वातावरण को स्वयं और समाज दोनों के लिए शुद्ध रखने में अपना अमूल्य योगदान अवश्य करें।

मेरी इस पहल का प्रभाव ऐसा रहा कि विभिन्न समाचार पत्रों ने भी अत्येष्टि संस्कार के इस स्वरूप के विषय में समाचार अपनी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किया तथा विशिष्ट संस्कार कराने हेतु मेरा संपर्क सूत्र प्रकाशित कर दिया। अब अनेक लोग मुझे अंत्येष्टि संस्कार कराने संपर्क करने लगे हैं तथा उनसे किसी धनराशि की अपेक्षा रखे बगैर स्वयं के वाहन से मैं जीवन के अंतिम संस्कार को संपन्न करवाने पहुँच जाता हूँ। छिंदवाड़ा में मेरा निवास होने के कारण इस क्षेत्र के लोग अंत्येष्टि संस्कार विधिवत कराना चाहें तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं मैं यथासंभव प्रयास करके इस कार्य को संपन्न कराने पहुँच जाउँगा।

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यहाँ पर कुछ विशेष लेखों को ब्लॉग की रूप में प्रेषित क्या जा रहा है। विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखे गए यह लेख हमारे लिए वैदिक सिद्धांतों को समझने में सहायक रहें गे, ऐसी हमारी आशा है।

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