Vedrishi

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श्री कृष्ण / Shri Krishn

श्री कृष्ण विष्णु जी के ८ वें अवतार माने गए हैं और इनका जन्म भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के १२ बजे हुआ था, जिसे हम “जन्माष्टमी” के नाम से मनाते हैं।

भारतीय संस्कृति के आदर्शों व पात्रों में श्री कृष्ण के अतिरिक्त संभवतः कोई भी अन्य पात्र, चरित्र वगुणों की इतनी अधिक विविधताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। श्री कृष्ण को ही १६ [16] कलाओं से परिपूर्ण बताया गया है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि विश्व-पटल पर श्री कृष्ण की तुलना में व्युत्पन्न साहित्य, कविता, नाटक, नृत्य, रंगमंच, चलचित्र (सिनेमा) और कला में, किसी पात्र का भी इनसे अधिक चित्रण नहीं किया गया है। श्री कृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य के संपूर्ण जीवन को झांकियों में नही दर्शाया जाता है।

  • एक बच्चा अपने हाथों और घुटनों पर रेंगते हुए

  • साथी मित्र ग्वालों के साथ हांड़ी से मक्खन लेते हुए

  • अपने हाथ में लड्डू लेकर चलते हुए

  • प्रलय के समय बरगद के पत्ते पर तैरते हुए एक आलौकिक शिशु जो अपने पैर की अंगुली को चूसता प्रतीत होता है।

  • कालिया नाग के फन पर बाँसुरी बजाते हुए

  • गोवर्धन पर्वत उठाए हुए

  • राधा व अन्य गोपियों के साथ

  • मित्र सुदामा के पैर धोते हुए

  • श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद (महाभारत के समय)

  • श्री कृष्ण विराट रुप

श्री कृष्ण के चित्रण में उनकी प्रतिमा में क्षेत्रीय विविधताएं उनके विभिन्न रूपों में देखी जाती हैं, जैसे ओडिशा में जगन्नाथ, महाराष्ट्र में विट्ठल या विठोबा, राजस्थान में श्रीनाथ जी, गुजरात में द्वारकाधीश और केरल में गुरुवायरप्पन और इन्ही विविधताओं के कारण हमें उनके अनुयायी अनेकों छोटे वर्ग और पंथों जैसे:, निंबर्क, चैतन्य, महानुभाव, वरकारी, रुद्र, राधा-बल्लभ, राधा-किशनी, आदि के नामों से मिलते हैं।

श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन संघर्षमय बीतता है। उनके जन्म से ही उनके वध हो जाने की आशंका बनी रहती है। अपने जीवन की रक्षा के लिए उन्हें पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षसों का वध करना पड़ता है। अपने मामा कंस का भी उन्हें वध करना पड़ा। माता-पिता से दूर पहले गोकुल में तदोपरांत नंद-गांव में जीवन बिताना किसी भी प्रकार से सामान्य, कष्ट-रहित जीवन नहीं कहा जा सकता। मथुरा पर कालयवन के आक्रमण करने पर श्री कृष्ण ने मथुरा का त्याग किया और सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया।

कालयवन एक यवन राजा था जिसे, उसे मिले एक दैविक आशीर्वाद के कारण, पराजित करना असंभव था। उसे पता चला कि केवल श्री कृष्ण ही उसको पराजित कर सकते हैं तो अहंकार में श्री कृष्ण की शक्ति जानने के उद्देश्य से कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध पाप का, बुराई का नाश करने के लिए नहीं था अपितु कालयवन के अहंकार के कारण था। युद्ध में अनेकों लोगों के प्राण जा सकते थे। निर्दोष न मारे जायें इसलिए श्री कृष्ण ने कालयवन के नाश के लिए युक्ति लगाई और रण छोड़ दिया जिस कारण उन्हें “रणछोड़दास” का नाम मिला। युक्ति अनुसार श्री कृष्ण मुचुकुन्द की गुफा में घुस गए और उन पर अपने वस्त्र डाल दिये। गुफा के अँधेरे में कालयवन सही से देख नहीं पाया और उसे लगा की श्री कृष्ण वहां आकर सो गए हैं। बिना देखे उसने वास्तविकता में सोए मुचुकुन्द को ललकार कर जगाया, और इसका परिणाम यह हुआ कि कालयवन भस्म हो गया।

मुचुकुन्द, श्री राम के पूर्वज थे। असुरो के विरुद्ध देवों की सहायता करने के फल स्वरुप वे अत्यन्त थक गए थे। देवों के कार्यों में सहायता करने के कारण इंद्रदेव उनसे प्रसन्न हुए थे और उन्हें मुक्ति के अतिरिक्त कोई भी अन्य वर मांगने को कहा था। वरदान में मुचुकुन्द ने बिना-अवरोध निद्रा मांगी, और माँगा कि उनकी निद्रा भंग करने वाला तुरंत भस्म हो जाएगा।

गुरु सांदीपनि को गुरु-दक्षिणा के रुप में उनके पुत्र पुनर्दत्त को पाताल-लोक से वापिस ले कर आना, जरासंघ से युद्ध, पांडवों की उनके वनवास के समय में, महाभारत के युद्ध में एवं इंद्रप्रस्थ की स्थापना में सदैव सहायता, श्री कृष्ण के जीवन के अन्य संघर्षों को दर्शाते हैं।

श्री कृष्ण साधारण मनुष्य नहीं थे। उन्होंने बाल्यकाल से ही ऐसे बड़े-बड़े कार्य किए जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। उनके पास अवश्य ही दैवी-शक्तियाँ थी परन्तु उन्होंने कभी भी चमत्कार के रुप में उनका प्रदर्शन नहीं किया। वे सदैव एक नटखट बालक, एक योद्धा, एक नीतिकार, एक बुद्धिजीवी, एक राजा, एक मित्र आदि, बन एक मनुष्य के जीवन को जीते रहे। उनकी मृत्यु भी एक साधारण श्राप-ग्रस्त व्यक्ति की मृत्यु दर्शाती है। शोक-संतप्त गांधारी के श्राप से ही जब वे एक वृक्ष के नीचे सो रहे थे एक शिकारी (नाम जरा) उन्हें हिरण समझ कर उन पर बाण चलाता है जिससे उनकी मृत्यु होती है।

श्री कृष्ण का जीवन एक साधारण मनुष्य के, जो बचपन में कोई राजकुमार नहीं अपितु ग्वाला है, जो अपनी आयु से अधिक आयु वालों के दायित्त्वों को भी सहजता से निभाता है, के गौरवशाली जीवन को दर्शाता है। संभवत: साधारण मनुष्य के रुप में उनका बहुमुखी, शक्तिशाली, उत्तरदेय परन्तु अनासक्त जीवन उनकी सार्वभौमिक लोकप्रियता का रहस्य है। वे श्री कृष्ण ही हैं जिन्हे भूत और भविष्य का ज्ञान है परन्तु वे साधारण मनुष्य की भाँति वर्तमान में ही जीते हैं।

हम न भूलें कि

  • कंस एक राजा था और श्री कृष्ण उसकी प्रजा थे। श्री कृष्ण ने बहुत से राक्षसों (दुष्ट कंस के दुष्ट कर्मचारी) और स्वयं कंस का वध किया। राज्य की दृष्टि मे श्री कृष्ण एक बहुत बडे अपराधी थे परन्तु जनता की दृष्टि मे बहुत महान, निष्पाप, भगवान थे और इन सब दुष्टों का वध कर उन्होने कोई बुरा कार्य नही किया था अपितु समाज को मुसीबतों से बचाया था।

  • कोई भी दुष्ट हो, चाहे वह राजा ही क्यों न हो उसे कभी भी सहन नही करना चाहिए।

  • राजा के नियमों से ‘धर्म’ बडा है। यदि राजा के नियम धर्म व न्यायानुसार नही है तो प्रभु भी उनका पालन करने की आज्ञा नही देते। (देखे: हम न भूलें-04)

  • श्री कृष्ण ने कंस को मार कर उसके राज्य को अपने पास नही रखा। उसे उसके सही स्वामी को दे दिया। भीम द्वारा जरासंघ का वध करवाने के पश्चात भी श्री कृष्ण उन सभी राजाओं को, जिन्हे जरासंघ ने बंदी बना रखा था, मुक्त करा दिया।

  • यदि आपके पास शक्ति है तो यह शक्ति किसी के दमन के लिए नही अपितु जो दबाए गए है, जिनके साथ अन्याय हो रहा है, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है, उनकी रक्षा, उनकी सहायता के लिए है।

  • कर्ण का रथ जब धरती मे धंस गया और वह रथ से उतर कर उसे निकालने का यत्न कर रहा था तो श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण पर बाण चलाने को कहा। कर्ण ने कहा कि हे कृष्ण! यह कैसा धर्म, कैसा न्याय कि मै इस समय शस्त्रहीन हूँ, अपने रथ पर भी नही और धरती पर खडा रथ को निकालने का प्रयास कर रहा हूँ और आप मुझ पर वार करने को कह रहे है। तब श्री कृष्ण ने कहा, “हे कर्ण! तू किस धर्म की बात करता है, जब द्रोपदी का चीर-हरण हो रहा था और वह धर्म की दुहाई दे रही थी, तब तेरा यह धर्म कहाँ था? जब अकेले अभिमन्यु को सात महारथियों ने घेर कर मार डाला तब यह न्याय और धर्म की जो बात तू कहता है, कहाँ था?” इन वचनों के बाद अर्जुन ने बाण चला कर कर्ण का वध कर दिया।

  • न्याय और धर्म की बात करने का अधिकार केवल उसी को है जो स्वयं न्याय और धर्म का पालन करता है।

  • श्री कृष्ण ने अर्जुन को कौरवों का नाश करने का उपदेश देकर यह समझाया कि पापी व दुष्ट चाहे कोई भी क्यों न हो, चाहे वे माता, पिता, भाई, गुरू, राजा, मित्र, संबंधी, परिजन आदि ही क्यों न हो, यदि वे पापी हैं, दुष्ट हैं तो तुम्हे उसका नाश करना ही चाहिए।

  • श्री कृष्ण ने पांडवो का साथ देते समय, जिन्हे दुर्योधन इतना शक्तिहीन समझता था कि एक सुई की नोक बराबर धरती देने के लिए भी सहमत नही था, प्रण किया था कि वे शस्त्र नही उठाऐंगे। उन्होंने अपनी नीति द्वारा कौरव पक्ष के बडे-बडे महारथियों, योद्धाओं को परस्त किया, मरवा दिया।

  • शक्ति से बडी नीति है। सही नीति बडी से बडी शक्ति का नाश कर सकती है।

  • श्री कृष्ण ने गुरु द्रोणाचार्य को मारने के लिए युद्धिष्ठर से कहा कि वह गुरु द्रोण से कह देवे कि आश्वथामा मारा गया जबकि अश्वथामा मारा नही गया था। यहाँ सोचने की बात है कि क्या वे कृष्ण जिन्हे भगवान भी कहा जाता है, जिनका सारा जीवन निष्पाप रहा है, किसी को ऐसा करने को कह सकते है जो झूठ हो? निष्पाप व्यक्ति तो सदा ही धर्म की बात कहेगा।

  • पापी का नाश करने के लिए तथाकथित झूठ, छल आदि अधर्म नही अपितु धर्म का पालन है। पापी, दुष्ट का नाश करना धर्म है चाहे कैसे भी उसका नाश किया जावे।

Shri Krishn

Shri Krishn is the 8th incarnation of Vishnu and was born in the month of Bhadrapad on the eighth day of Krishn-Paksh, Rohini-Nakshatra at 12 o’clock in the night, which we celebrate as “Janmashtami”.

Apart from Shri Krishn, perhaps no other ideals and character of Indian culture, represent diversity and vastness. Only Shri Krishn is said to possess the 16 different types of arts and skills. It will not be an exaggeration to say that in literature, poetry, drama, dance, theatre, cinema and art, no one else has been depicted more on the world stage as Shri Krishn. No other character of Indian epic is depicted in the tableaux as much as the entire life of Shri Krishn.

  • a baby crawling on his hands and knees

  • taking butter from the clay pot with fellow cowherds

  • carrying laddoos in his hand

  • a supernatural baby floating on a banyan leaf at the time of world destruction appearing to be sucking its toe.

  • playing flute on the hood of ‘Kaliya Nag’

  • lifting ‘Govardhan’ mountain

  • with ‘Radha’ and other ‘gopis’

  • washing the feet of friend Sudama

  • Shri Krishn-Arjun dialogue (during Mahabharat)

  • Shri Krishn Virat Roop

There are regional variations seen in the depiction of Shri Krishn in his various forms, such as Jagannath in Odisha, Vitthal or Vithoba in Maharashtr, Shrinath ji in Rajasthan, Dwarkadhish in Gujarat and Guruvayurappan in Kerala. It is due to these variations we find many of his followers in small groups and. sects such as:, Nimbark, Chaitany, Mahanubhav, Varkari, Rudr, Radha-Vallabh, Radha-Kishni, etc.

Shri Krishn’s entire life was filled with struggle. He was under constant threat of getting killed right from his birth. To save his life he had to kill demons like Putana, Shaktasur, Trinavarta and more. He had to kill his maternal uncle Kans too. Living away from parents, first in Gokul and then in Nand-Gaon, by no means can be called as a normal, trouble-free life. After Kalyavan’s attack on Mathura, Shri Krishn left Mathura and built the city of Dwarka in Saurashtr, Gujarat and established his kingdom there.

Kalyavan was a Yavan king who was impossible to defeat due to a divine blessing. He came to know that only Shri Krishn can defeat him. To estimate the strength of Shri Krishn, Kalyavan attacked Mathura. The purpose of this war was not to destroy evil and sin but to satisfy the ego of Kalyavan. Many people could have lost their lives in the war. Shri Krishn planned for the death of Kalyavan and in his plan left the battleground (so that the innocent do not get killed) due to which he got the name of “Ranchoddas”. According to the plan, Shri Krishn entered “Muchukand’s” cave and covered him with his clothes. Kalyavan could not see properly in the darkness of the cave and assumed that it is Shri Krishn who is sleeping. Without checking, he woke Muchukand, who actually was the one sleeping there, and as a result, Kalyavan got burned to ashes.

Muchukand was the ancestor of Shri Ram. He helped “Devtas” against the “Asurs” and got physically tired. Indradev was pleased with him for helping them and asked him to ask for any boon other than salvation. Muchukand asked for uninterrupted sleep, and wished that the one who disturbs his sleep would be consumed by fire instantly.

The following incidents of Shri krishn’s life highlight his few other struggles-: bringing back Guru Sandipani’s son Punardutt from ‘Patal-lok’ as ‘Guru-dakshina’, his battle with Jarasangh, helping and assisting Pandavs during their exile, in the battle of Mahabharat and later while establishing Indraprasth.

Shri Krishn was not an ordinary man. He accomplished things which were not possible for any common man, right from childhood. He certainly had divine powers, but never showed them in the form of a miracle. He always lived the life as a common, ordinary man being a naughty child, a warrior, a moralist, an intellectual, a king, a friend etc. His death was also that of an ordinary cursed person. He was cursed by grieving Gandhari, who held him responsible for the death of her sons. As per this curse when he was sleeping under a tree, a hunter (named Zara) mistook him as a deer and shot an arrow at him, which led to his death.

The life of Shri Krishn depicts the glorious life of an ordinary man, who in childhood was not a prince but a cowherd, who easily surpasses the responsibilities of his age and expectations. Perhaps his versatile, powerful, accountable but unattached life as an ordinary human being is the secret of his universal popularity. It is Shri Krishn who knows the past and the future but lives in the present like an ordinary man.

Let us not forget that

  • Kans was a king and Shri Krishn was his subject. Shri Krishn killed many demons (evil servants of evil Kans) and Kans too. In the eyes of the state, Shri Krishn was a big criminal, but for the public, he was sinless and God. He did not do any wrong by killing all those wicked, but saved the society from troubles.

  • Anyone who is evil, even if he is a king, should never be tolerated.

  • Dharm is important than the rules of the king. If the rules of the king are not according to Dharm and justice, even the Lord does not allow them to be followed. 

  • Shri Krishn killed Kans and gave the kingdom to its rightful owner. After letting Jarasangh being killed by Bhim, he released all the kings who were held captive by Jarasangh.

  • If you have power, then use the power not for suppressing anyone, but for protecting, helping those who are suppressed and those whose rights are being violated.

  • When Karn’s chariot sank into the earth and he was trying to get it out after getting down from the chariot, Shri Krishn tells Arjun to shoot an arrow at Karn. Karn said that O Krishn! what kind of Dharm are you following? Is it fair to aim at an armless warrior who is not on his chariot but rather trying to free the chariot out of the ground. Shri Krishn said, “O Karn! what dharm are you talking about, when Draupadi was being dragged and humiliated and she was crying for help, then where was this dharm of yours. When Abhimanyu was alone and surrounded by seven war chiefs and killed by them, was that fair.” After these words, Arjun shot an arrow and killed Karn.

  • Only those who follow dharm themselves and behave correctly have the right to talk of justice and dharm.

  • Shri Krishn taught Arjun to destroy the Kauravs and explained: no matter whoever commits sin, may it be mother, father, brother, teacher, king, friend, relative, family, etc. must not be shown any mercy.

  • Shri Krishn, while supporting the Pandavs, vowed that he would not take up arms. Just by his policy, Shri Krishn got the Kauravs defeated and their war-chiefs killed.

  • Policy is greater than power. The right policy can destroy the greatest of power.

  • Shri Krishn asked Yudhishthir to kill Guru Dronachary by telling him that Ashwathama (his son) was killed even though he was not. The point to ponder here is if Shri Krishn, who is also called as God, whose whole life has been sinless, can ask someone to lie? A sinless person will always speak about dharm.

  • So-called lies, deceit etc. is not adharm, but the observance of dharm if they are used to destroy the sin. It is dharm to destroy the wrong-doer and the wicked irrespective of the chosen way.

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