Vedrishi

अलंकारभूषण

Alankarbhushan – by Dr Kundan Kumar(डॉ कुन्दन कुमार )

₹225.00

Subject : Alankarbhushan
Edition : 2020
Publishing Year : 2016
SKU # : 37611-PP00-0H
ISBN : 9788194969211
Packing : 1
Pages : 245
Dimensions : 14X22X4
Weight : 1500
Binding : Paperback
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काव्केय के परंपरागत स्वरुप के विवेचन में अलङ्कार को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तथाकथित रस, ध्वनि, रीति, वक्रोक्ति आदि उपादान अपनी वैषयिक गम्भीरता तथा प्रौढ विवेचना से समन्वित भले ही रहे हों किन्तु अलङ्कार-तत्त्व की व्यापकता और सर्वसुगमता की समानता वे नहीं कर सकते। काव्य – शिक्षा में प्रवेश करते ही अलङ्कारों की पहली सीढ़ी मिलती है और कविता के रससिद्ध होने पर अलङ्कार सहज ही काव्य में आने लगते हैं। तभी ध्वन्यालोककार ने कहा है'अपृथग्यन- निर्वर्त्यः सोऽलङ्कारो ध्वनेर्मत:' (ध्वन्यालोक 2.16)। तात्पर्य यह है कि काव्य के प्रथम सोपान से अन्तिम सोपान तक अलङ्कार कवि को बाँधे रहते हैं।

सम्पूर्ण साहित्यशास्त्र के इतिहास में जितना विकास अलङ्कारों का हुआ, उतना किसी अन्य उपादान का नहीं । कहाँ भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र (17.43) में ‘उपमा रूपकं चैव दीपकं यमकं तथा' कहकर केवल चार अलङ्कारों की सत्ता नाटक के पाठयांश के सन्दर्भ में स्वीकार की थी (300 ई०पू०); वहीं दो सहस्र वर्ष बाद ये ही अलङ्कार क्रमश: बढ़ते हुए अप्पयदीक्षित के कुवलयानन्द में 123 की संख्या तक पहुँच गये। अन्य काव्योपादानों का विकास इस गति से नहीं हुआ। रसों, गुणों और रीतियों को न्यूनाधिक रूप से अपनी नियत संख्या में ही रहना पड़ा। वक्रता के स्थूल भेद छह से आगे नहीं बढ़ सके, उधर क्षेमेन्द्र भी औचित्य भेद के नैयत्य से ग्रस्त रहे ।

विकास की दृष्टि से ही नहीं, विवेचन की अनिवार्यता भी अलङ्कारों को मुख्य स्थान पर रखने में सहायक बनी । भामह ( 550 ई०) को अलङ्कार प्रस्थान का प्रवर्तक आचार्य कहा गया है, जिन्होंने अनुप्रास और यमक के रूप में दो शब्दलङ्कारों तथा उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दीपक आदि छत्तीस अर्थालङ्कारों का विवेचन किया था। तदनन्तर दूसरे प्रस्थानों के आचार्यों ने भी अपनी सम्बद्धता की उपेक्षा करके भी अलङ्कारों का विवेचन तो किया ही, उनकी संख्या वृद्धि में भी योगदान दिया। वे चाहे रीतिवादी आचार्य वामन हों ( 800 ई०), वक्रोक्ति प्रस्थान के व्याख्याता कुन्तक (दशम शताब्दी का उत्तरार्ध) हों अथवा रसवादी आचार्य मम्मट हों ( ग्यारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध ) । अलङ्कारों का प्राचुर्य उद्वेजक होता है, ऐसा अभिमत ध्वनिवादियों ने तथा औचित्यसमर्थक क्षेमेन्द्र ने भी दिया। अतः केवल शब्दचमत्कार या अर्थचमत्कार पर बल देने वाले कवियों की रचनाओं को अधम-काव्य की श्रेणी में मम्मट ने रखा। अलङ्कार प्रयोग में यह ध्यान रहे कि अलङ्कार्य या कथ्य भी सुन्दर तथा हृदयावर्जक हो । – 

Paperback245 PagesEdition 2020ISBN 9788194969211In StockOriginal Publisher Edition

Frequently Asked Questions

इस पुस्तक का बाइंडिंग, पेज, संस्करण, ISBN और वज़न क्या है?
बाइंडिंग: Paperback | पृष्ठ: 245 | संस्करण वर्ष: 2020 | ISBN: 9788194969211 | वज़न: लगभग 1500 ग्राम। यह जानकारी उत्पाद पृष्ठ पर दर्ज वास्तविक विवरण पर आधारित है।
इस पुस्तक के लेखक कौन हैं?
प्रकाशक कौन सा है?
इस पुस्तक का ऑनलाइन मूल्य क्या है?
इस पुस्तक का वर्तमान ऑनलाइन मूल्य ₹225 है। मूल्य और उपलब्धता समय के साथ बदल सकती है; कृपया ऑर्डर से पहले उत्पाद पृष्ठ पर अद्यतन मूल्य देखें।
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