किंग्सवे कैम्प, दिल्ली, सन् 1963, पाँच वर्ष की वय हो चली थी। पिताजी की आर्थिक स्थिति हम भाईयों को पाठशाला भेजने में अक्षम थी। सो, निश्चय हुआ कि घर पर ही पठन-पाठन कराया जाय। परिणामतः देवनागरी लिपि के स्वर-व्यञ्जनों के ज्ञान के साथ-साथ 100 तक गिनती और 10 तक पहाडे माताजी (श्रीमती मायावती जी शर्मा) के अथक परिश्रम से कण्ठस्थ हो गये थे। प्रायः 7 का पहाडा सुनाने में त्रुटि हो जाती थी, 10 का पहाड़ा सबसे सरल लगता था। सन् 1964 (दिल्ली), वसन्त पञ्चमी का दिन था। प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त हुआ ही था कि पिताजी (पं० मदन शर्मा ‘सुधाकर’ कविरन) का आदेश सुनायी दिया, ‘यहाँ आओ, आज से विधिवत् अध्ययन आरम्भ होगा’। सरस्वती वन्दनोपरान्त पिताजी ने ‘अमरकोष’ मेरे हाथों में देकर उसका प्रथम लोक- “यस्य ज्ञानदयासिन्धोरगाधस्यानघा गुणाः। सेव्यतामक्षयो धीराः स श्रिये चामृताय च ॥” सुनाकर उसको शनैः शनै: दोहराने को कहा। पाँच-छह वार अटक-अटक कर बोलने, किन्तु उच्चारण अशुद्ध होने से पिताजी की ताडना सुन-सुनकर धीरे-धीरे शुद्ध उच्चारण करने लगा था। वर्ष 1964-65 (दिल्ली-श्रीमहावीरजी-फिरोजाबाद) व्यतीत होते-होते सम्पूर्ण ‘अमरकोष कण्ठस्थ हो गया था। वर्ष 1966-67 (जयपुर-जोबनेर-जयपुर-दिल्ली-मेरठ) में पिताजी ने ‘लघुसिद्धान्त कौमुदी’, ‘अष्टाध्यायी’, बाणभट्टकृत ‘कादम्बरी’ और ज्योतिष के आधारभूत ग्रन्थ ‘लघु पाराशरी’ को पढ़ाना प्रारम्भ किया। परिणामतः बाल्यकाल से ही साहित्य तथा ज्योतिष के पठन-पाठन में रुचि जागृत हो गयी। वर्ष 1970 (मेरठ, मयराष्ट्र) में मम प्रथमान्तिम विद्यागुरु पिताजी का 44 वर्ष की वय में असामयिक निधन हो जाने से संस्कृत भाषा के पठन-पाठन का क्रम अवरुद्ध हो गया। तथापि प्राच्य भाषा के प्रति सतत अनुराग बने रहने पर भी मैं संस्कृत भाषा के उस अद्भुत, अप्रतिम ज्ञान और वैदुष्य का सहस्रांश भी प्राप्त न कर सका, जिसको मैंने अपने पिताजी में देखा था। अस्तु,
आज जब मैं यह सब लिखने बैठा हूँ, साहित्य और ज्योतिष की विभिन्न विधाओं के अध्येता वा विद्यार्थी-रूप में अर्धशती व्यतीत होने को है। इन वर्षों में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, प्राचीनार्वाचीन भारतीय-पाश्चात्य ज्योतिषशास्त्र, नाटक, महाकाव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास प्रभृति सहस्रों पुस्तकें पढ़ी और समय-समय पर उनमें से कतिपय उद्धरणों को स्मृत्यार्थ ‘क्रोड-पुस्तिकाओं में लिखा। किन्तु अधिकांश कोड-पुस्तिकाएँ उचित देखभाल के अभाव में नष्ट हो गयी अथवा खो गई हैं। तथापि जो ‘क्रोड-पुस्तिकाएँ’ शेष रही, उनमें लिखे उद्धरणादि का उपयोग मैंने इस पुस्तक में अनेकत्र करते हुए फलितादि के स्वानुभवों को भी यथास्थान सम्मिलित किया है।
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