निरुक्ताध्ययन के प्रयोजन निर्दिष्ट करते हुए यास्क कहते हैं कि इसके विना मन्त्रों में अर्थप्रतीति सम्भव नहीं है। अर्थज्ञान के विना स्वर-संस्कार आदि व्याकरण की व्युत्पत्तिप्रक्रिया भी नहीं हो सकती। इसलिए निरुक्त वेदार्थ के प्रसङ्ग में जहाँ अर्थावबोध में मुख्य साधन है, वहीं व्याकरण का भी आधार है। अतः अर्थ के स्तर पर मन्त्र एवं पदों को उद्घाटित-विश्लेषित करके समझाने के लिए निरुक्त-विद्या का अभ्यास परम आवश्यक है।
प्रस्तुत प्रबन्ध निरुक्तविमर्शः को पाँच अध्यायों में पूर्ण किया गया है। प्रथम अध्याय का शीर्षक ‘निरुक्त का उद्भव और विकास’ है, इसमें निरुक्त सम्बन्धी ऐतिह्य के साथ अन्य आवश्यक विषयों का भी निरूपण किया गया है। द्वितीय अध्याय का शीर्षक ‘यास्कीय पदचतुष्टय-विमर्श’ है। इसमें नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप पदचतुष्टय पर गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की गयी है। तृतीय अध्याय का नाम ‘निरुक्त-निर्वचन-विमर्श’ है जिसमें निर्वचन सम्बन्धी सम्पूर्ण विषयवस्तु सविस्तार वर्णित की गई है। चतुर्थ अध्याय का शीर्षक ‘देवतास्वरूप-विमर्श’ है। इसमें वैदिक-देवताओं का विशद वर्णन किया गया है। पञ्चम अध्याय ‘यास्कीय निरुक्त के कतिपय अपव्याख्यात स्थल’ है तथा इसके अन्तर्गत तीन अत्युपयोगी परिशिष्टों को देकर इस ग्रन्थ को पूर्णता प्रदान की गयी है।
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