Vedrishi

मनुस्मृति

Manusmriti – by Dr. Surendera Kumar (डॉ. सुरेन्द्र कुमार )

₹600.00

Subject :  मनुस्मृति
Edition : 2017
Publishing Year : 2017
SKU # : 36516-HP00-0H
ISBN : 9788192932019
Packing : Hardcover
Pages : 815
Dimensions : 20X25X6
Weight : 1810
Binding : Hard Cover
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स्मृतियों या धर्मशास्त्रों में मनुस्मृति सर्वाधिक प्रामाणिक आर्ष ग्रन्थ है। मनुस्मृति का महत्त्व इसी से ज्ञात होता है कि इसे ऋषियों ने औषध कहा है – “मनुर्वै यत्किञ्च्चावदत् तद् भैषजम्” अर्थात् मनु ने जो कुछ कहा है, वह औषध के समान गुणकारी एवं लाभकारी है। शास्त्रकारों ने मनुस्मृति के महत्त्व को निर्विवाद रूप में स्वीकार करते हुए ही यह स्पष्ट घोषणा की है कि –

“मनुस्मृति-विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते। वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः” – बृहस्पति स्मृति खंड 13-14

जो स्मृति मनुस्मृति के विरुद्ध है, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है। वेदार्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब में प्रधान एवं प्रशंसनीय है।

इस तरह दीर्घकाल से मनु का महत्त्व शिष्टजन स्वीकारते आ रहें हैं।

मनुस्मृति से न केवल वैदिक धर्मी प्रभावित थे अपितु बौद्ध मतावलम्बी भी प्रभावित थे। इसका एक उदाहरण उन्हीं के ग्रन्थ धम्मपद से देखिए –

“अभिवादनसीलस्य निच्चं बुढ्ढापचायिनो।

चत्तारो धम्मा वड्ढन्ति आयु विद्दो यसो बलम्”।।- धम्मपद 8.20

धम्मपद का ये श्लोक मनुस्मृति के निम्न श्लोक का पाली रूपान्तरण मात्र है –

“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते, आयुर्विद्या यशो बलम्”।। – मनुस्मृति 2.121

बोद्ध महाकवि अश्वघोष ने भी अपनी कृति वज्रसूचिकोपनिषद् मे अनेक मनु के वचनों को उद्धृत किया है।

इस तरह मनुस्मृति का व्यापक प्रचार दृष्टिगोचर होता है लेकिन विगत कुछ वर्षों से मनुस्मृति का विरोध शुरू हो गया है। इसके निम्न कारण है –

  • मनु में शुद्र विरोधी श्लोकों का पाया जाना।
  • मनु में स्त्री विरोधी श्लोकों का पाया जाना।
  • कुछ अवैज्ञानिक और अवांछनीय तथ्यों का मनुस्मृति में प्राप्त होना।

ये सब मनुस्मृति में उत्तरोत्तर काल में हुए प्रक्षेप का परिणाम है। मनुस्मृति में कौनसा श्लोक प्रक्षिप्त है और कौनसा सही, ये ज्ञात करने के लिए ऐसे अनुसंधात्मक कार्य की आवश्यकता है जो सकारण प्रक्षिप्त श्लोंकों का तार्किक विवरण प्रस्तुत कर सकें और मनुस्मृति के शुद्ध और वास्तविक स्वरूप का दिग्दर्शन करवा सकें।

इस विषय में डॉ.सुरेन्द्र कुमार जी ने मनुस्मृति पर अनुसंधान करते हुए, अनेक वर्षों के श्रम के पश्चात् मनुस्मृति का प्रस्तुत् भाष्य प्रकाशित किया है। प्रस्तुत् भाष्य में मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोंकों का निर्धारण निम्न मानदण्डों के आधार पर किया है –

  • अन्तर्विरोध या परस्परविरोध (2) प्रसंगविरोध (3) विषयविरोध या प्रकरणविरोध (4) अवान्तरविरोध (5) शैलीविरोध (6) पुनरुक्ति (7) वेदविरोध।

इन मानदण्डों के आधार पर प्रक्षिप्त श्लोक निर्धारित किए है।

इस भाष्य के अध्ययन द्वारा निम्न तथ्य पाठकों को दृष्टिगोचर होंगे –

  • मनुस्मृति स्वायम्भुव मनु रचित आदिसृष्टि काल की रचना है।
  • मनुस्मृति में वर्णव्यवस्था कर्मणा मान्य है, जन्मना नही।
  • मनुस्मृति में मांसभक्षण पाप है।
  • मनुस्मृति में स्त्रियों के सम्मान का कथन है, उनकों दुःख देना कुटुम्ब के विनाश का मूल कारण है।
  • मनुस्मृति दहेज प्रथा का स्पष्ट विरोध करती है।
  • मनुस्मृति पंचमहायज्ञों को महत्त्व देती है और उनका कर्तव्यकर्म के रूप में विधान करती है।
  • शुद्रों के लिए दासता का विधान मनुकृत नही है।
  • शुद्र और स्त्री दोनों को धर्मपालन का अधिकार है।

इस प्रकार अनेकों तथ्य इस भाष्य के अध्ययन से दृष्टिगोचर होंगे।

प्रस्तुत भाष्य की निम्न विशेषताएँ है –

  • इस भाष्य में प्रक्षिप्त श्लोकों के अनुसन्धान के मानदण्डों का निर्धारण और उन पर समीक्षा की गई है।
  • श्लोकों की विभिन्न शास्त्रों के प्रमाणों के माध्यम से पुष्ट अनुशीलन समीक्षा की गई है।
  • मनु के वचनों से मनु के भावों को स्पष्ट किया है।
  • प्रस्तुत भाष्य में मनु की मान्यता के अनुकूल एवं प्रसंगसम्मत अर्थ किए गये है।
  • विस्तृत भूमिका द्वारा मनुस्मृति का पुनर्मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है।
  • जिस श्लोक का अनुवाद महर्षि दयानन्द जी द्वारा किया गया है उसे प्रस्तुत भाष्य में तत्तत्श्लोक के साथ संकलित किया गया है।
  • संस्कृत पदों के साथ हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया है।
  • भाष्य के अन्त में सभी अनुक्रमणिकाओं और आवश्यक सूचियों को उद्धृत किया गया है।

मनु के वास्तविक सिद्धान्तों और भावों को समझने के लिए, प्रस्तुत भाष्य को मंगवाकर अवश्य अध्ययन करें। इससे मनुस्मृति विषयक भ्रमों का नाश तो होगा ही तथा साथ ही ये ग्रन्थ शौधार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए भी लाभकारी होगा। प्रस्तुत भाष्य हिन्दी में होने के कारण, इससे हिन्दी भाषायी नागरिक भी लाभान्वित होंगे।

Vedrishi | मनुस्मृति?मनुस्मृति और धर्म Vedrishi | मनुस्मृति?*

मनुस्मृति के विषय में भ्रांतियों निवारण के लिए आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित एवं डॉ सुरेंद्र कुमार द्वारा लिखित मनुस्मृति भाष्य उपलब्ध है।

वास्तविक धर्म क्या है और धर्म कैसा होना चाहिए।धर्म क्या है इस पर वैशेषिक के महर्षि कणाद कहते हैं:-
*’यतोऽभ्युदय निःश्रेयस्सिद्धि स धर्मः’।*

अर्थात् जो कर्म हमारा अपना उद्धार अरें और प्राणी मात्र को जिससे सुख मिले वह धर्म है।
परमात्मा ने संसार रचा।उसमें नाना प्रकार के फल फूल,वनस्पतियाँ,औषधियाँ,अन्न,आदि उसने हमारे लिए उत्पन्न किये।उस परमपिता ने हमें उनका प्रयोग भी वेद द्वारा बता दिया।वेद ज्ञान सृष्टि की उत्पत्ति के समय हमारे लिए दिया।वह सब प्राणीमात्र के लिए एक-सा होने से संसार भर के मनुष्यों का धर्म वेद है।
बाकी जो ये मत मतान्तर चल रहे हैं ये धर्म नहीं मत हैं,जिन्हें मनुष्य अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए चलाता है।और इन मतावादियों की पुस्तकों में अपने ही मत वालों का भला सोचना बाकी दूसरे मजहब के लोग हैं उनसे नफरत करना लिखा है।अतः जो विद्वान होते हैं वे इन मजहबी किताबो के सत्य असत्य की खोज कर लेते हैं और जो साधारण जन होते हैं वे इनके चंगुल में फंस जाते हैं।अतः इनका त्याग ही हितकर है।
धर्म १४०० अथवा ३-४ हजार वर्ष से नहीं बल्कि जब से सृष्टि बनी है तब से है।इस लिहाज से भी यह मत,धर्म की कसौटी पर पूरे नहीं उतरते,धर्म तो सारे संसार के लिए एक ही है।

मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण कहे हैं और मनु सृष्टि के प्रथम शासक चक्रवर्ती (विश्व) भर के राजा हुए हैं उनका रचा स्मृति ग्रन्थ सब विद्वानों ने हर
प्रकार से उच्च और श्रेष्ठ माना है।

धर्म के लक्षण ये हैंः-

*धृति क्षमा दमो अस्तेयं शोचं इन्द्रियनिग्रहः ।*
*धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।*

*व्याख्या:–*

*(1) धृतिः―*सदा धैर्य रखना,अधीर न होना।
*(2) क्षमा―*हानि,लाभ,मान,निन्दा,स्तुति,सुख-दुःख,में सहनशील रहना।
*(3) दमो―*मन को सदा धर्म में प्रवृत्त रखना और अधर्म से रोकना,अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न करनी।
*(4) अस्तेय―*चोरी त्याग अर्थात् बिना आज्ञा,अथवा छल कपट,विश्वासघात व किसी व्यवहार अथवा वेद विरुद्ध प्रचार से पर पदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ना साहूकारी कहलाती है।
*(5) शौच―*राग द्वेष,पक्षपात छोड़ के बाहर भीतर की पवित्रता।बाहर की पवित्रता जल,मृत्तिका से होती है।
*(6) इन्द्रियनिग्रह:―*इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोककर सदा धर्म में चलाना।
*(7) धीः―*बुद्धिनाशक तथा मादक द्रव्यों का त्याग,दुष्टों के संग न करना,आलस्य प्रमाद आदि का त्याग और श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन,सत्पुरुषों का संग और योग से बुद्धि को बढ़ाना।
*(8) विद्या―*पृथ्वी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थ ज्ञान और उनसे यथा योग्य उपकार लेना।
*(9) सत्य―*मन,वाणी,आत्मा में एक सा कर्म होना इससे विपरित मन में कुछ और,वाणी में कुछ और,आत्मा में कुछ असत्य है।
*(10) अक्रोध–*क्रोध आदि दोषों को छोड़ के शान्ति आदि गुणों को धारण करना।

अब इन पुस्तकों को इन लक्षणों से मिलाएँ और देखें कि वे इस कसौटी पर कितने पूरे उतरते हैं।एक स्थान पर फिर मनुजी कहते हैं-

*वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।*
*एतच्चर्तु विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ।।*

*अर्थ:-*वेद,स्मृति,वेदानुकूल उप्रोक्त मनुस्मृत्यादि शास्त्र,सत्य पुरुषों का आचार जो सनातन अर्थात् वेद द्वारा परमेश्वर प्रतिपादित कर्म और अपनी आत्मा में प्रिय अर्थात् जिसको आत्मा चाहता है जैसा कि सत्य भाषण,ये चार धर्म के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्माधर्म का निश्चय होता है।
क्या किसी भी प्राणी को निर्दोष में हिंसा करना धर्म है?क्या मनुष्यों में एक-दूसरे से द्वेष करना धर्म है?क्या अपने को ऊँचा सोचना और दूसरों को काफिर कहना धर्म का अंग है क्या बहुत विवाह करना धर्म की आज्ञा है।और यदि यह धर्म के अंग किसी की बुद्धि में हैं तो यह धर्म नहीं और न ही कोई ऐसा सम्प्रदाय धर्म की गिनती में आ सकता है।यदि ये धर्म हैं तो फिर अधर्म क्या है?

जिस व्यक्ति अथवा समाज के अन्दर अच्छे गुण सब प्राणियों से प्यार और दया,सत्याचार,पवित्र आहार और शुभ संकल्प के विचार हैं वे सब सज्जन आर्य और इससे भिन्न सभी दैत्य काफिर हैं।चाहे कोई हिन्दू,मुसलमान,ईसाई कोई भी हो।

कहने का तात्पर्य यह है कि यह सभी सम्प्रदाय मनुष्यों के बनाए हुए हैं और समय-२ पर स्वार्थी लोगों ने अपने-२ स्वार्थ की सिद्धि हेतु बनाये हैं और यह सम्प्रदाय(मजहब) प्यार नहीं सिखाते,लड़ना-भिड़ना सिखाते हैं,ईर्ष्या-द्वेष सिखाते हैं।जोड़ना नहीं तोड़ना सिखाते हैं।केवल वैदिक धर्म ही है जो सच्चाई का मार्ग दिखाता है।जीवन को ऊंचा उठाता है।

इन मतवादियों ने धर्म के स्वरुप को इस प्रकार बिगाड़ के रख दिया है कि साधारण तो क्या समझदार मनुष्य भी इस प्रकार भ्रम में पडे हुए हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है।

कई मूँछ-दाढ़ी रखना धर्म मानते हैं कई केवल दाढ़ी को धर्म ले बैठे हैं।कोई तिलक आदि लगाना धर्म मानते हैं।कई पांच बार नमाज पढ़ना धर्म मानते हैं,कोई मन्दिर में जाकर मूर्ति पर जल चढ़ाना कोई गिरजाघर में जाना धर्म माने बैठे हैं कोई व्रतों में भूखे रहने को धर्म समझ बैठे हैं तो कोई रोजे रखकर धर्म का पालन करते हैं।

कोई जागरण करवाना धर्म समझते हैं तो कोई असंख्य प्राणियों की एक ही दिन में हिंसा सवाब (धर्म) मानते हैं।इस प्रकार इन सबका यत्न स्वर्ग के लिए है।पर घोर अंधकार में ठीक मार्ग न मिलने से जैसा मार्ग न पाने वाले राही की भांति यह सब ठोकरें खाते फिरते हैं।ठीक दिशा मिलेगी नहीं जब तक वेद की शरण में नहीं आते क्योंकि वेद ही सबका धर्म है।

हर मानव का चाहे वह अपने आपको हिन्दू,मुसलमान,सिख,जैनी,ईसाई अथवा किसी सम्प्रदाय से जुड़ा मानता हो।मानव का माता के गर्भ से जन्म लेने पर वह न हिन्दू होता है न मुसलमान न ईसाई न सिख।और यह सब भेद जब उसको कुछ ज्ञान होता है तब होता है,ज्ञान से तात्पर्य सत्य ज्ञान नहीं,किन्तु उस सम्प्रदाय का ज्ञान जिससे उस परिवार का जोड़ है सम्बन्ध है और सत्यासत्य से मिश्रित है। सत्य ज्ञान तो ठीक दिशा देगा।

तात्पर्य यह है कि वेद सबके लिए संसार भर के स्त्री पुरुषों के लिए है।किसी एक व्यक्ति विशेष वर्ग अथवा देश के लिए नहीं और यही स्वर्ग (बहिश्त) का मार्ग है।इसमें पक्षपात नहीं,संसार के समस्त प्राणीमात्र के लिए कल्याण पथ-प्रदर्शक है।सूर्य की भांति चमकता ज्ञान का भंड़ार है।जैसे परमात्मा के बनाये हुए सूर्य,चन्द्र,तारे,जल,हवा,जमीन आदि का उपयोग सबके लिए है,किसी से ईश्वर ने भेदभाव नहीं किया,और कर्मों का फल भी सबको भोगना पड़ता है चाहे मुसलमान हो या हिन्दू।इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि दोनों जातियों में सुख-दुःख देखे जाते हैं।इसी प्रकार वेद का ज्ञान ईश्वर ने सबके लिए दिया है,कोई उससे आचरण में लाकर लाभ न उठाये तो इसमें ईश्वर क्या करे।

Hard Cover815 PagesEdition 2017ISBN 9788192932019In StockOriginal Publisher Edition

Frequently Asked Questions

इस पुस्तक का बाइंडिंग, पेज, संस्करण, ISBN और वज़न क्या है?
बाइंडिंग: Hard Cover | पृष्ठ: 815 | संस्करण वर्ष: 2017 | ISBN: 9788192932019 | वज़न: लगभग 1810 ग्राम। यह जानकारी उत्पाद पृष्ठ पर दर्ज वास्तविक विवरण पर आधारित है।
इस पुस्तक के लेखक कौन हैं?
लेखक: Dr. Surendera Kumar (डॉ. सुरेन्द्र कुमार )। इस लेखक की अन्य पुस्तकें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
प्रकाशक कौन सा है?
इस पुस्तक का ऑनलाइन मूल्य क्या है?
इस पुस्तक का वर्तमान ऑनलाइन मूल्य ₹600 है। मूल्य और उपलब्धता समय के साथ बदल सकती है; कृपया ऑर्डर से पहले उत्पाद पृष्ठ पर अद्यतन मूल्य देखें।
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