वेदों का अध्ययन करने के लिए छह वेदाङ्गों का निर्माण हुआ। इनमें से एक निरुक्त है जिसकी विषयवस्तु शब्दों का व्युत्पत्ति-विश्लेषण है और इसका प्रमुख उद्देश्य दुर्बोध वैदिक शब्दों का अर्थ स्पष्ट करना है। यास्क का निरुक्त ग्रन्थ वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति पर आधारित है। निरुक्त को छोड़कर सभी वेदाङ्ग मूल ग्रन्थ के रूप में हैं, जबकि निरुक्त निघण्टु की व्याख्या है। व्याख्या होने पर भी इसका वेदाङ्गों में परिगणन होना इसकी महत्ता का परिचायक है।
प्रस्तुत ग्रन्थ में यास्क के निरुक्त का अध्ययन करते समय यह प्रयास रहा है कि यास्क का प्राच्य और अर्वाच्य की दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए। इस विषय में एक तथ्य ध्यान देने योग्य है कि निर्वचन के माध्यम से यास्क का उद्देश्य शब्द के मूल तक ले जाने का नहीं था, वरन् उनका उद्देश्य शब्द के साथ अर्थ के सम्बन्ध को निरूपित करना था।
इस भाष्य में वैदिक वाङ्गय को हृदयङ्गम बनाने के लिये आचार्य यास्क, दुर्ग, स्कन्द, सायण, वेङ्कट माधव तथा महर्षि दयानन्द प्रभृति व्याख्याओं का न केवल अवलोकन किया गया है, अपितु निष्कर्षों को सुसङ्गत बनाने के लिए उनको आधार भी बनाया गया है।
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