Vedrishi

भारत में गणित शास्त्र के विकास की चिन्तन-धारा

Bharat men Ganit Shastra ke Vikas Ki Chintan-Dhara

600.00

SKU field_64eda13e688c9 Category puneet.trehan
Subject : Vedic Mathematics 
Edition : 2019
Publishing Year : 2019
SKU # : 36708-PP00-0H
ISBN : 9788171106592
Packing : Hard Cover
Pages : 427
Dimensions : 14X22X6
Weight : 580
Binding : Hard Cover
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पुस्तक का नाम गणित-शास्त्र के विकास की भारतीय परम्परा

लेखक का नाम डॉ. सुद्युम्नु जी आचार्य

इस विश्व में गणित शास्त्र का उद्भव तथा विकास उतना ही प्राचीन है, जितना मानव-सभ्यता का इतिहास है। मानव जाति के उस काल से ही उसकी गणितीय मनीषा के संकेत प्राप्त होते हैं।

विश्व के पुस्तकालय के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद संहिताओं से गणित तथा ज्योतिष को अलग-अलग शास्त्रों के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी थी। यजुर्वेद में खगोलशास्त्री के लिए नक्षत्रदर्श शब्द का प्रयोग किया है तथा सलाह दी गई है कि उच्च प्रतिभा प्राप्त करने के लिए उसके पास जाना चाहिये। वेद में शास्त्र के रुप में गणित शब्द का नामतः कही उल्लेख तो नहीं हुआ किन्तु गणक के रूप में लेखा-जोखा रखने वाले का उल्लेख अवश्य मिलता है। गणित शब्द का प्राचीनतम प्राप्त उल्लेख लगध मुनि प्रोक्त वेदांग-ज्योतिष में प्राप्त एक श्लोक शास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि वर्तते में मिलता है। इससे भी पूर्व गणित का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद् में राशि विद्या के नाम से मिलता है।

आगे चलकर इसी गणित का नाम पाटी गणित हो गया जिसे धूलिकर्म भी कहा गया क्योंकि अंकीय संक्रियाएँ जमीन पर धूल पर तथा तख्ती पर होने से यह नाम प्रसिद्ध हुए। जब अरब ने इस पद्धति का अनुसरण किया तब इसका नाम – “इल्म हिसाब अल तख्त प्रचलित हुआ। यह शास्त्र भारतीयों के लिए प्राचीन काल से ही आवश्यक और प्रतिभा को बढा़ने वाला माना गया है

एतद् यत् बहुधास्मदादिजडधी-धीवृद्धिबुद्ध्या बुधैर्।

विद्वच्चक्रचकोरचारुमतिभिः पाटीति तन्निर्मितम्।।” – सिद्धान्त शिरोमणि, प्रश्नाध्याय श्लोक 4

आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थ शास्त्र में अंक ज्ञान को महत्त्वपूर्ण मानते हुए लिखा है – “वृतचौलकर्मा लिपि संख्यान चोपयुजीत -कौ. अर्थशास्त्र १/४/४
अर्थात् शिक्षा में प्रारम्भ में अक्षर लिपि और संख्या लिखना सिखाना चाहिए

भारत के समान विदेशों में भी गणितीय सिद्धान्तों का विकास हुआ। वहाँ चिड़ियों के पर से संक्रियाएं करते हुए गणितीय प्रश्न हल किये जाते रहे हैं।

आज हमारे समक्ष गणित के प्राचीनकाल से अबतक देश-विदेश के अनेकों विद्वानों के गणितशास्त्र उपस्थित है, इन सभी का क्रमिक इतिहास और इनके द्वारा दी गई गणितीय संक्रियाओं और सिद्धान्तों के अध्ययन से यथा सम्भव लाभ अवश्य ही लेना चाहिए। इसी उद्देश्य से प्रस्तुत पुस्तक गणित-शास्त्र के विकास की भारतीय परम्परा लिखी गई है। इस ग्रन्थ में मुख्यतः भारतीय गणितज्ञों के सिद्धान्तों का परिचय है। इस पुस्तक की निम्न विशेषताएँ है

  1. इसमें गणित के अनेक विषयों का कालक्रमानुसार विकास के साथ समन्वित तथा सम्पूर्ण स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। श्लोक में कहे गए नियमों को आधुनिक चिह्नों से युक्त सूत्र का स्वरूप प्रदान किया है। प्रत्येक नियम के विषय में यह बताने की चेष्टा की गई है कि यह आधुनिक सूत्र से किस प्रकार समकक्ष है।

  2 विविध नियमों के लिए देश-विदेश से आदान प्रदान को निरूपित किया गया है। अन्य देशों से आदान के पश्चात् भी उनकी विलक्षणता को सिद्ध किया गया है।

  3 सभी नियमों की उपपत्ति पर विशेष ध्यान दिया गया है। यदि किसी नियम की उपपत्ति प्राचीन ग्रन्थों के ही किसी ग्रन्थ से सम्भव है तो उसे विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। उपपत्ति के इस क्रम में यदि किसी अन्य सूत्र या सिद्धान्त का संकेत मिलता हो तो उसे भी प्रस्तुत किया गया है।

4 अन्य शास्त्रों में भी प्रसंगवश कहे गए सिद्धान्तों के लिये भी यथावसर स्थान दिया गया है।

5 उदाहरणों में प्रतिबिम्बित सामाजिक, आर्थिक स्थिति का भी आवश्यकतानुसार वर्णन किया गया है।

6 प्राचीन दुर्लभ ग्रन्थों के माध्यम से अंक-गणित की विधि को बीज-गणित से अथवा अंक-गणित की उपपत्ति को रेखा-गणित द्वारा दिखाया गया है।

7 आधुनिक गणित के लिये प्राचीन नियमों के तथा विविध पारिभाषिक शब्दों के अवदान को विस्तार के साथ निरूपित किया गया है।

इस पुस्तक का पाठकों को यथेष्ट लाभ लेना चाहिए।  

Weight 6415688 g

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