युद्ध करने एवं लड़ने की प्रवृत्ति प्राणियों में अनादिकाल से ही चली आ रही है। देशकाल एवं परिस्थिति के अनुसार इसका विकास या हास होता रहा है। मनुष्येतर प्राणियों में यह प्रवृत्ति नख-दन्त और अन्य उपायों द्वारा अपनी रक्षा करने या उदरपूर्ति तक ही सीमित है. परन्त मनुष्य प्रहार के इन साधनों से विहीन है। उसने अपने बद्धि-कौशल से विविध शस्त्रास्त्रों का आविष्कार करके न केवल हिंस्रपाणियों से अपनी सुरक्षा की, अपितु विश्व के समस्त जीव-जन्तु तथा अन्य साधनों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। शस्त्रास्त्र एवं युद्ध सम्बन्धी ज्ञान-विज्ञान का कथन करनेवाले शास्त्र को धनर्वेद कहा गया है।
ऋषियों ने सृष्टि के आदि में व्यवहार के लिये सभी वस्तुओं के नाम एवं कर्त्तव्य कर्मों का निर्धारण वेद से ही किया। संसार के उपलब्ध साहित्य में वेद सबसे प्राचीनतम हैं। इनका ज्ञान चार ऋषियों के हृदय में परम पिता परमात्मा की प्रेरणा से हुआ। इन चारों वेदों के चार उपवेद हैं। ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गान्धर्ववेद और अथर्ववेद का अर्थवेद (शिल्पशास्त्र) सुप्रसिद्ध है। इन उपवेदों में आयुर्वेद के ग्रन्थ चरक, सुश्रुत् प्रभृति, गान्धर्ववेद के भरतनाट्यं इत्यादि और अर्थवेद के मयादि द्वारा विरचित शिल्पशास्त्र के ग्रन्थ अश्वशास्त्र, सूपशास्त्र, चौंसठ कला इत्यादि के ग्रन्थ अब भी किसी-न-किसी रूप में उपलब्ध हैं, परन्तु धनुर्वेद-सम्बन्धी मूलग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं।
यद्यपि विश्वामित्र, जामदग्न्य, शिव, वशिष्ठादि के नामों से युक्त धनुर्वेद की छोटी पुस्तकें मिलती हैं, परन्तु इनको मूलग्रन्थ स्वीकार करना बहुत ही कठिन है। स्वामी दयानन्द जी ने महर्षि अङ्गिराकृत धनुर्वेद का उल्लेख किया है। आचार्य द्विजेन्द्रनाथ शास्त्री ने द्रोणाचार्य द्वारा निर्मित ‘धनुष्प्रदीप’ नामक ग्रन्थ का वर्णन किया है जिसमें सात सहन श्लोक थे। इसी भाँति वीरवर परशुरामजी द्वारा प्रणीत साठ सहस्र श्लोकवाला धनुश्चन्द्रोदय नामक ग्रन्थ भी विद्यमान था, ऐसी उनकी मान्यता है। परन्तु इन ग्रन्थों का कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता। जामदग्न्य धनुर्वेद के नाम से कुछ श्लोकों का सङ्कलन अवश्य उपलब्ध है।
महर्षि वैशम्पायनकृत नीतिप्रकाशिका में धनुर्वेद का आदि प्रवक्ता ब्रह्मा को माना है, जिसने एक लाख अध्यायोंवाले धनुर्वेद का उपदेश वेन-पुत्र महाराज पृथु को दिया। इसी का संक्षेप करके रुद्र ने पचास हज़ार, इन्द्र ने बारह, प्राचेतस ने छह और बृहस्पति ने तीन हज़ार अध्यायों से युक्त धनुर्वेद का प्रवचन किया। शुक्राचार्य ने उसे और संक्षिप्त करके एक सहस्र अध्यायोंवाले नीतिशास्त्र (शुक्रनीति) का निर्माण किया।
Dhanurveda – by Swami Devvrat Sarswati (स्वामी देवव्रत सरस्वती)
धनुर्वेद
Dhanurveda – by Swami Devvrat Sarswati (स्वामी देवव्रत सरस्वती)
₹600.00
In stock
Subject : Dhanurveda
Edition : 2020
Publishing Year : 2020
SKU # : 36996-PP00-0H
ISBN : N/A
Packing : Hard Cover
Pages : 336
Dimensions : 20X24X2
Weight : 1070
Binding : Hard Cover
Description
Hard Cover336 PagesEdition 2020In StockOriginal Publisher Edition
बाइंडिंग: Hard Cover | पृष्ठ: 336 | संस्करण वर्ष: 2020 | वज़न: लगभग 1070 ग्राम। यह जानकारी उत्पाद पृष्ठ पर दर्ज वास्तविक विवरण पर आधारित है।
लेखक: Swami Devvrat Sarswati (स्वामी देवव्रत सरस्वती)। इस लेखक की अन्य पुस्तकें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
प्रकाशक: Swami Devvrat ji। इस प्रकाशक की अन्य पुस्तकें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
इस पुस्तक का वर्तमान ऑनलाइन मूल्य ₹600 है। मूल्य और उपलब्धता समय के साथ बदल सकती है; कृपया ऑर्डर से पहले उत्पाद पृष्ठ पर अद्यतन मूल्य देखें।
Vedrishi मूल प्रकाशकों की प्रामाणिक हिंदी और वैदिक पुस्तकें बेचता है। हर ऑर्डर नये कंडीशन में भेजा जाता है। किसी भी समस्या के लिए आप हमारे संपर्क पेज से सहायता ले सकते हैं।
Vedrishi एक विशेषज्ञ हिंदी / वैदिक बुक स्टोर है जहाँ 1400+ पुस्तकें उपलब्ध हैं। हम प्रामाणिक प्रकाशकों की किताबें नए कंडीशन में भेजते हैं, आसान ऑनलाइन ऑर्डरिंग देते हैं, और ऑर्डर संबंधी सहायता के लिए व्हाट्सऐप / फ़ोन पर उपलब्ध रहते हैं। पेमेंट ऑनलाइन और सुरक्षित चैनलों से किया जा सकता है।
Additional information
| Weight | 1070 g |
|---|

