Vedrishi

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प्रवेशकः

Praveshak

700.00

Subject : grimmer, literature , Sanskrit, ashtadhyayi 
Edition : N/A
Publishing Year : N/A
SKU # : 37123-PP00-0S
ISBN : N/A
Packing : N/A
Pages : N/A
Dimensions : N/A
Weight : NULL
Binding : N/A
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पुस्तक का नाम प्रवेशकः

हिन्दी अनुवादक पं. थानेशचन्द्र उप्रेती

संस्कृत भाषा विश्व की सभी भाषाओं से प्राचीन व समृद्ध भाषा है। इसी भाषा में भारत का प्राचीन साहित्य लिखा गया है, जो अनेक दृष्टियों से सराहनीय है।

जिस प्रकार इस भाषा का साहित्य समृद्ध व सुन्दर है, उसी प्रकार इस संस्कृत भाषा या देववाणी का व्याकरण भी विशाल व व्यवस्थित है।

सम्भवतः विश्व में किसी भी भाषा के व्याकरण पर इतनी गवेषणा, नहीं हुई होगी, जितनी गवेषणा या छानबीन इस संस्कृत भाषा के व्याकरण पर हुई है, अतएव संस्कृत साहित्य में संस्कृत व्याकरण का भी वही महत्त्व पूर्ण स्थान है, जो स्थान अन्य दर्शन, गणित, और धर्मशास्त्र आदि विषयों का है।

व्याकरण के अध्ययन के लिए मुख्यतः 12 वर्ष की युक्ति अधिक प्रचलित है, ऐसे में अन्य व्यक्ति जिनके पास समय का अभाव है और व्याकरण सीखनें के इच्छुक हैं, ऐसे ही लोगों के लिए केरलदेश के श्री तृक्कण्टियूर अच्यूतपिषारक नामक विद्वान नें प्रवेशकः नामक इस पद्यात्मक व्याकरण ग्रन्थ का निर्माण किया है।

यह मूलग्रन्थ केवल कारिकाबद्ध है। इसमें व्याकरण जैसे नीरस विषय को भी पद्यबद्ध व सरस भाषा में रच दिया है। इस ग्रन्थ को बनाने का उद्देश्य प्रकट करते हुए स्वयं ग्रन्थकार नें लिखा है

प्रवेशकेन जानन्ति शब्दान् व्याकरणाक्षमाः।

इक्षुं खादन्ति नादन्ता रसं शर्करया विदुः।।

अर्थात् बालक व वृद्ध जिनके दान्त नहीं हैं वे गन्ने का स्वाद जिस प्रकार शर्करा द्वारा जानते हैं, उसी प्रकार बालकवत् मन्दबुद्धि वाले भी जो सहसा पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश नहीं पा सकते हैं, वे मेरे द्वारा निर्मित इस प्रवेशकः नामक पद्यबद्ध व्याकरण के सहारे सरलतया साधु शब्दों का ज्ञान प्रवेश कर सकते है।

इस ग्रन्थ की सरलता व सरसता पाठकों को बलात् ही आकृष्ट कर देगी। इस ग्रन्थ पर लिखी सुबोधिनी हिन्दी व्याख्या की निम्न विशेषताऐं हैं

इसमें उक्त ग्रन्थ का सरल हिन्दी अनुवाद तथा साथ साथ पाणिनीय व्याकरण  की सुरक्षा के लिए सुबोधिनी व्याख्या तथा कुछ व्याकरण सम्बन्धित विशिष्ट बोतों की टिप्पणी भी दी गई है।

सुबोधिनी व्याख्या में प्रवेशकसिद्धि शब्दों को ही पाणिनीय व्याकरण द्वारा भी सामान्य रूप से सिद्धि की गई है, जिसमें यथाशक्ति खास खास सूत्रों का भी तथा प्रक्रिया का भी निर्देश किया गया है।

इस प्रकार से एक तरह से उक्त व्याकरण तथा पाणिनीय व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भी हो जाता है।

आशा है कि व्याकरण के पाठक इस ग्रन्थ से समुचित लाभान्वित होंगे।

 

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