Vedrishi

Free Shipping Above ₹1500 On All Books | Minimum ₹500 Off On Shopping Above ₹10,000 | Minimum ₹2500 Off On Shopping Above ₹25,000 |
Free Shipping Above ₹1500 On All Books | Minimum ₹500 Off On Shopping Above ₹10,000 | Minimum ₹2500 Off On Shopping Above ₹25,000 |

वरुण की नौका

Varun Ki Nauka

200.00

SKU 36825-LJ00-0H Category puneet.trehan

In stock

Subject : Vedic Devata Varun
Edition : N/A
Publishing Year : N/A
SKU # : 36825-LJ00-0H
ISBN : N/A
Packing : N/A
Pages : N/A
Dimensions : N/A
Weight : NULL
Binding : Hard Cover
Share the book

पुस्तक का नाम – वरुण की नौका
लेखक – आचार्य प्रियव्रत
वेद परमात्मा प्रदत्त नित्य ज्ञान है | वेदों में अनेकों ज्ञान विज्ञान का उल्लेख है | प्रस्तुत पुस्तक “ वरुण की नौका “ में ऋग्वेद और अथर्ववेद में आये ऐसे मन्त्रों का संग्रह है जिसके देवता वरुण है ,ऋग्वेद में ऐसे नौ सूक्त है और अथर्ववेद में पांच | उन सूक्तों की व्याख्या इस पुस्तक में की गयी है |
वरुण के अनेकों अर्थ होते है लेकिन पुस्तक में परमात्मा अर्थ ले कर अध्यात्मपरख अर्थ आचार्य जी ने किया है |
व्याकरण अनुसार वरुण शब्द वृञ् धातु से बनता है जिसका अर्थ है वरण करना ,चुनना ,स्वीकार करना .चाहना और निवारण करना ,ढक लेना ऐसा होता है | परमात्मा सबके वरण करने योग्य है इसलिए वे वरुण है | स्वयं वेद में भी परमात्मा का नाम वरुण है –
“ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान् |
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्र्वानमाहु: ||” –ऋग्वेद १/१६४/४६
अर्थात उस एक को ही इंद्र ,वरुण ,अग्नि ,दिव्य ,सुपर्ण ,गरुत्यमान ,यम ,मातरिश्र्वा आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है |
आचार्य सायण ने भी वरुण का अर्थ परमात्मा अनेको जगह लिया है –
चर्षणीना धर्ता (ऋग्वेद ५/६७/२) अर्थात चर्षणियो का रक्षक वरुण
वरुणनामक: सोमदेवो जगदीश्वरेणाभिन्न: – तै.स. १/२/८/१
अर्थात वरुणनामक सोमदेव जगदीश्वर से भिन्न नही है |
यजु. ४/३१ में उवट और महीधर ने भी वरुण को परमात्मा लिखा है –
“ परब्रह्मलक्षणों वरुणस्तं वयं स्तुम इति “ अर्थात परब्रह्म स्वरूप जो वरुण है उसकी हम स्तुति करते है |
इस तरह वरुण का अर्थ हुआ वरणीय परमात्मा उसी वरणीय परमात्मा की कृपा रूपी नौका से संसार रूपी सागर से पार जाते है अर्थात तर जाते है | उस भवसागर से पार लगाने वाले वरुण के क्या क्या गुण कर्म है ,उसने हमे क्या कर्तव्य बताये है , उसकी कैसे उपासना करनी चाहिए ये सब इस पुस्तक में वरुण सूक्तों की व्याख्या में आचार्य जी ने स्पष्ट किये है |
इन वरुण सूक्तों की व्याख्या में प्रथम वेदमन्त्र दिया गया है | उसके नीचे मन्त्र का शब्दार्थ | कही कही कठिन शब्दों के आशय को स्पष्ट करने के लिए कुछ शब्दों का अध्याहार भी दिया है | शब्दार्थ के बाद मन्त्र के विशद विवरण ,स्पष्टीकरण और भाष्य को दिया है |
विवरण में मन्त्र के गूढ़ रहस्य को अच्छी तरह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है | विवरण लिखते समय यह भी ध्यान रखा गया है कि मन्त्र के शब्दों का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाए | पुस्तक में विवरण के अनन्तर एक दो वाक्यों में आत्मा को सम्बोधन करके उस मन्त्र के आशय को हृदयङम करके चरित्र में ढालने का प्रयास किया है |
आशा है सभी पाठक गण इस वरुण की नौका का अध्ययन और आचरण से वरुण की नौका में अध्यात्म रूपी मार्ग की यात्रा करेंगे |

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Varun Ki Nauka”

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recently Viewed

You're viewing: Varun Ki Nauka 200.00
Add to cart
Register

A link to set a new password will be sent to your email address.

Your personal data will be used to support your experience throughout this website, to manage access to your account, and for other purposes described in our privacy policy.

Lost Password

Lost your password? Please enter your username or email address. You will receive a link to create a new password via email.

Close
Close
Shopping cart
Close
Wishlist