Vedrishi

वरुण की नौका

Varun Ki Nauka

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Subject : Vedic Devata Varun
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Publishing Year : N/A
SKU # : 36825-LJ00-0H
ISBN : N/A
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Binding : Hard Cover
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पुस्तक का नाम – वरुण की नौका
लेखक – आचार्य प्रियव्रत
वेद परमात्मा प्रदत्त नित्य ज्ञान है | वेदों में अनेकों ज्ञान विज्ञान का उल्लेख है | प्रस्तुत पुस्तक “ वरुण की नौका “ में ऋग्वेद और अथर्ववेद में आये ऐसे मन्त्रों का संग्रह है जिसके देवता वरुण है ,ऋग्वेद में ऐसे नौ सूक्त है और अथर्ववेद में पांच | उन सूक्तों की व्याख्या इस पुस्तक में की गयी है |
वरुण के अनेकों अर्थ होते है लेकिन पुस्तक में परमात्मा अर्थ ले कर अध्यात्मपरख अर्थ आचार्य जी ने किया है |
व्याकरण अनुसार वरुण शब्द वृञ् धातु से बनता है जिसका अर्थ है वरण करना ,चुनना ,स्वीकार करना .चाहना और निवारण करना ,ढक लेना ऐसा होता है | परमात्मा सबके वरण करने योग्य है इसलिए वे वरुण है | स्वयं वेद में भी परमात्मा का नाम वरुण है –
“ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान् |
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्र्वानमाहु: ||” –ऋग्वेद १/१६४/४६
अर्थात उस एक को ही इंद्र ,वरुण ,अग्नि ,दिव्य ,सुपर्ण ,गरुत्यमान ,यम ,मातरिश्र्वा आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है |
आचार्य सायण ने भी वरुण का अर्थ परमात्मा अनेको जगह लिया है –
चर्षणीना धर्ता (ऋग्वेद ५/६७/२) अर्थात चर्षणियो का रक्षक वरुण
वरुणनामक: सोमदेवो जगदीश्वरेणाभिन्न: – तै.स. १/२/८/१
अर्थात वरुणनामक सोमदेव जगदीश्वर से भिन्न नही है |
यजु. ४/३१ में उवट और महीधर ने भी वरुण को परमात्मा लिखा है –
“ परब्रह्मलक्षणों वरुणस्तं वयं स्तुम इति “ अर्थात परब्रह्म स्वरूप जो वरुण है उसकी हम स्तुति करते है |
इस तरह वरुण का अर्थ हुआ वरणीय परमात्मा उसी वरणीय परमात्मा की कृपा रूपी नौका से संसार रूपी सागर से पार जाते है अर्थात तर जाते है | उस भवसागर से पार लगाने वाले वरुण के क्या क्या गुण कर्म है ,उसने हमे क्या कर्तव्य बताये है , उसकी कैसे उपासना करनी चाहिए ये सब इस पुस्तक में वरुण सूक्तों की व्याख्या में आचार्य जी ने स्पष्ट किये है |
इन वरुण सूक्तों की व्याख्या में प्रथम वेदमन्त्र दिया गया है | उसके नीचे मन्त्र का शब्दार्थ | कही कही कठिन शब्दों के आशय को स्पष्ट करने के लिए कुछ शब्दों का अध्याहार भी दिया है | शब्दार्थ के बाद मन्त्र के विशद विवरण ,स्पष्टीकरण और भाष्य को दिया है |
विवरण में मन्त्र के गूढ़ रहस्य को अच्छी तरह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है | विवरण लिखते समय यह भी ध्यान रखा गया है कि मन्त्र के शब्दों का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाए | पुस्तक में विवरण के अनन्तर एक दो वाक्यों में आत्मा को सम्बोधन करके उस मन्त्र के आशय को हृदयङम करके चरित्र में ढालने का प्रयास किया है |
आशा है सभी पाठक गण इस वरुण की नौका का अध्ययन और आचरण से वरुण की नौका में अध्यात्म रूपी मार्ग की यात्रा करेंगे |

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