यास्क के निरुक्त का उद्देश्य शब्द का निर्वचन करना है। निर्वचन उस प्रक्रिया का नाम है, जिसमें शब्द के वर्तमान स्वरूप से मूल स्वरूप तक की यात्रा की जाती है। इसका स्वरूप व्याकरण में प्रचलित व्युत्पत्ति से भिन्न होता है। व्युत्पत्ति में केवल शब्द के प्रकृति-प्रत्यय को स्पष्ट किया जाता है, जबकि निर्वचन में ध्वन्यात्मकता के आधार पर, इतिहास का आश्रय लेकर, अर्थ के स्वरूप का विवेचन किया जाता है।
कहने का आशय यह है कि ‘शब्द’ नाम से जाने वाली इकाई के बाह्य तथा आन्तरिक रूपों में साम्य स्थापित करने का प्रयास किया है। या यह कह सकते हैं कि इस निर्वचन-विज्ञान में अर्थ तथा ध्वनि की समरूपता के आधार पर शब्द के मूलरूप (क्रियारूप) तक पहुँचने का मार्ग अन्वेषित किया जाता है।
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